लखनऊ। दुनिया भर में अपने 36 किस्मों के आकषर्ण का जादू बिखेरने वाले चिकन व जरी- जरदोज़ी के कारीगर बदहाली के शिकार हैं। महंगाई के इस दौर में दिन भर काम करने के बाद बमुश्किल 80 रुपये पाने वाले मजदूर अपनी मूलभूत जरूरतें भी पूरी करने में अक्षम हैं। असंगठित होने के कारण इनकी समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं है। चिकनकारी व जरदोजी के कारीगर पुराने लखनऊ, काकोरी, मलिहाबाद, सीतापुर और बाराबंकी में हैं। चिकनकारी व जरदोजी के कारीगरों की मजदूरी तय नहीं है। आर्डर देने वाला व्यक्ति पीस के हिसाब से जो भी इन्हें देता है, उसे मुकद्दर समझ कर रख लेते हैं। आर्थिक तंगी का ये हाल है कि बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते। कारीगरों ने बताया कि अब ठेके पर काम मिलता है और महीने के आखिरी में ढाई से तीन हजार रुपये की कमाई हो पाती है। पुराने लखनऊ में तो कई जगहों पर निजी सेंटरो के अलावा लोगों ने अपने घरो में इसके कारखाने खोल रखे हैं। सरकारी सेंटरो पर थोड़ी ज्यादा मजदूरी मिलती है लेकिन वहां भुगतान में दिक्कत है। वहां काम करने का अर्थ है पैसे के लिए बार-बार चक्कर लगाना। चिकनकारी में कपड़े की कटाई, सिलाई, काज बनवाई, छपाई,कढ़ाई, धागों की कटाई, धुालाई, प्रेस और पैकिंग सभी कामों के अलग-अलग मजदूर हैं। वृद्ध होने और बीमार होने के बाद चिकन व जरदोजी के कारीगरों के पुनर्वास की कोई योजना नहीं है। कारीगर मोहम्मद मुकीम कहते हैं कि यहां तो मेहनत की कीमत भी नहीं मिलती। कुछ गैर सरकारी संस्थाओं की मदद को छोड़कर सरकारी मदद तो दूर की कौड़ी है।

प्रस्तुति- मोहम्मद इरफान शाहिद